HIV/एड्स: जागरूकता बढ़ी, पर कलंक की जंग अभी भी बाकी!

हर साल, विश्व एड्स दिवस हमें याद दिलाता है कि इस वैश्विक महामारी के खिलाफ हमारी लड़ाई अभी भी खत्म नहीं हुई है। भारत ने HIV/एड्स के बारे में लोगो में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।

पिछले एक दशक में, सरकारी अभियानों, डिजिटल plateform और आशा कार्यकर्ताओं की घर-घर जाकर काउंसलिंग ने जानकारी का स्तर बहुत ऊपर उठाया है। लोगों को अब HIV के संगरक्षण , रोकथाम, और उपचार के बारे में लोगो को बुनियादी ज्ञान मिल रहा है। लेकिन सिर्फ जानकारी ही काफी नहीं है विशेषज्ञों का कहना है कि। जागरूकता के बावजूद, एक बड़ी चुनौती आज भी हमें पीछे खींच रही है—वह है सामाजिक कलंक अथवा लोगो की मानसिकता (Social Stigma)

कलंक की दीवार: क्यों जाँच से कतराते हैं लोग?

आरंभिक पहचान और समय पर एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी (ART) जीवन बचाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से, सामाजिक कलंक के कारण ग्रामीण इलाकों में लोग जाँच केंद्रों से दूर रहते हैं।

  • गोपनीयता का अभाव: ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों में गोपनीयता बनाए रखना मुश्किल होता है। लोगों को यह डर होता है कि उन्हें पहचाना जाएगा और समुदाय में उनका बहिष्कार हो सकता है। यह ‘सामाजिक जोखिम’ अक्सर इलाज के ‘चिकित्सीय लाभ’ पर भारी पड़ जाता है।

  • विलंबित निदान: इस डर के कारण युवा या , प्रवासी मजदूर, और विवाहित महिलाएं स्क्रीनिंग टेस्ट के लिए आगे नहीं आते। इलाज में देरी से बहुत बुरा पर्भाव पड़ता है , जिससे मरीज अधिक जटिलताओं के संपर्क में आ जाता है , और वायरस दूसरों तक फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है।

महिलाओं पर कलंक का दोहरा वार होता है

यह कलंक महिलाओं पर असमान रूप से (disproportionately) अधिक भारी पड़ता है। ग्रामीण इलाकों की महिलाएं, जो अक्सर आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित होती हैं, उन्हें बिना पुरुष परिवार के सदस्यों की मंजूरी के इलाज कराने में कठिनाई होती है। प्रवासी मजदूरों की पत्नियाँ या प्रसव-पूर्व जाँच (antenatal testing) के दौरान पॉज़िटिव पाई जाने वाली महिलाएं सबसे ज़्यादा सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है , भले ही इसमें उनकी कोई गलती न हो।

विज्ञान के सामने चुनौती: इलाज इतना मुश्किल क्यों है ?

जागरूकता और सामाजिक चुनौतियों के अलावा, भी वैज्ञानिक मोर्चे पर भी HIV का पूरी तरह से इलाज (Cure) खोजना एक कठिन चुनौती है।

एंटीरेट्रोवाइरल दवाएँ (ART) वायरस को नियंत्रित करके व्यक्ति को सामान्य जीवन जीने में मदद जरुर करती हैं, लेकिन ये वायरस को शरीर से जड़ से खत्म नहीं कर पातीं। इसका मुख्य कारण यह है कि HIV वायरस शरीर में ऐसी जगहों पर छिप जाता है, जिन्हें ‘वायरल रिज़र्वायर’ कहा जाता है। ये दवाएँ इन छिपी हुई जगहों तक नहीं पहुँच पातीं, जिससे इलाज बंद होते ही वायरस दोबारा फिर से सक्रिय हो सकता है। इसलिए, जब तक कोई सम्पूर्ण इलाज नहीं मिल जाता, नियमित ART ही सबसे प्रभावी उपाय है।

आगे का रास्ता: शिक्षा और समावेश से सामान्यीकरण

इस कलंक को कम करने के लिए केवल मेडिकल जानकारी देना काफी नहीं होता है। हमें एक बहु-स्तरीय रणनीति की आवश्यकता होती है:

  1. शिक्षा: स्कूलों में आयु-उपयुक्त HIV शिक्षा जरुर शुरू होनी चाहिए।

  2. सामुदायिक नेतृत्व: पंचायतों, ग्रामीण नेताओं, और स्थानीय प्रभावशाली लोगों को जागरूकता अभियानों का समर्थन करना जरुरी है ताकि HIV एक सामुदायिक-स्वामित्व वाला मुद्दा बन सके , न कि किसी व्यक्ति का निजी बोझ बने ।

  3. सख्त प्रोटोकॉल: ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को गोपनीयता रखने के लिए सख्त प्रोटोकॉल लागू करने होंगे, ताकि लोग बिना किसी डर के जाँच और उपचार के लिए आगे आ सकें।

HIV के साथ जीवन जी रहे लोगों के प्रति सहानुभूति, समझ और समावेश ही वह रास्ता है, जिस पर चलकर हम इस कलंक की दीवार को तोड़ सकते हैं और अंततः, एड्स-मुक्त भविष्य के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

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